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ज़िन्दगी भर की खुमारी जा रही है- रमेश कँवल

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’34
ज़िन्दगी भर की खुमारी जा रही है
चार काँधे पे सवारी जा रही है
आपकी यादों से यारी जा रही है
रफ़्ता रफ़्ता खाकसारी जा रही है
जिसको था अभिमान ख़ुद पर दिन जो पलटे
हेकड़ी उस की उतारी जा रही है
वोट चोरी का नैरेटिव गढ़ रहे हैं
सीट जब सारी की सारी जा रही है
जब अदालत में बहस करने न पाए
रोड पर हैं, इन्किसारी जा रही है
क़ायदे-क़ानून से मतलब कहाँ है
संस्था की भद उतारी जा रही है
जब हुआ बेचैन बच्चा माँ के हाथों
बद नज़र उसकी उतारी जा रही है
भ्रम की दौलत की तिजारत कर रहे हैं
जब सियासत की खुमारी जा रही है
खो गए शुहरत की मण्डी में 'कँवल' हम
रोज़ इक दुल्हन सँवारी जा रही है
सृजन - 18 अगस्त, 2025
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन