#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’29
ग़रीबी ने जब तक निहारा नहीं
अमीरी का चमका सितारा नहीं
खुशी जो तुम्हारी नहीं हो सकी
कोई रिश्ता उससे हमारा नहीं
मेरे सामने मुस्कुराती रहो
कोई इस से दिलकश नज़ारा नहीं
सिफ़ारिश से सम्मान मिलने लगे
जो क़ाबिल थे उनको पुकारा नहीं
सभी मसखरे मंच पर छा गए
ग़ज़ल ले के कोई पधारा नहीं
झुलसता रहा धूप में इक शजर
किया छाँव सुख से किनारा नहीं
अना के महल में रहा मैं 'कँवल'
कभी हाथ मैंने पसारा नहीं
सृजन : 14 सितंबर,2025
जिउतिया