#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’75
हमसफ़र मेरा जब से रूठ गया
मस्तियों का गिलास टूट गया
साधुओं के लिबास में था जो
मान सम्मान मेरा लूट गया
जब उम्मीदों से भर गया दामन
ग़म की दुनिया से नाता छूट गया
छल से धोखा से था कमाया बहुत
जब घड़ा भर गया तो फूट गया
जब हुकूमत ने क़हर बरपाये
ज़ालिमों का पसीना छूट गया
आया डिजिटल का नया दौर जहाँ
धन चुराने का सभी रूट गया
साधना हम लगे जो करने 'कँवल'
कामनाओं का मोह रूठ गया
सृजन 24 नवंबर, 2025
हंस में भेज गया 3-12-2025