#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’62
समय के साथ चल कर देखना था
नज़रिए को बदल कर देखना था
हमेशा क्यों ख़ुशी की ही तलब हो
ग़मों से भी बहल कर देखना था
जो राहें ज़िन्दगी को मसलहत दें
उन्हीं राहों पे चल कर देखना था
अगर हो साथ में बच्चा तो ख़ुद भी
खिलौनों को मचल कर देखना था
सेहत की फ़िक्र जो करते हैं उनको
सवेरे कुछ टहल कर देखना था
मुसलसल काविशों पर कर भरोसा
मुसीबत से निकल कर देखना था
इरादे दुश्मनों के कब थे अच्छे
'कँवल' हमको सँभल कर देखना था
सृजन 21 जुलाई,2025
मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन फ़ऊलुन