#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’59
लम्स पाँवों का बिछा था रेत पर
उसकी यादों का नशा था रेत पर
दिल के दरवाज़े पे थी दस्तक कोई
आँखों से आँसू गिरा था रेत पर
झिलमिलाते थे सितारे मस्त हो
अक्स उनका काँपता था रेत पर
मछलियों पर खिल-खिलाती चाँदनी
ऐश का मंज़र पड़ा था रेत पर
डांडिया में नीम उरियां लड़कियाँ
जिस्म नर्तन में रमा था रेत पर
ख़ुदकशी जम्हूरियत करने लगी
राहबर ने क्या कहा था रेत पर
वस्ल के मौसम की चाहत में ‘कँवल’
उसका इक नक़्शा बना था रेत पर
सृजन - 7 अक्टूबर,2025
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 212
फ़ेस बुक पर 8 अक्टूबर,2025 को पोस्टेड