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पराए गीत भी अपना बताए जाते हैं - रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’71
पराए गीत भी अपने बताए जाते हैं
इसी तरह से वो महफ़िल में छाए जाते हैं
ख़ुशी के मौक़े पे मातम मनाए जाते हैं
चिराग़ भी यहाँ दिन में जलाए जाते है
उन्हें पता नहीं क्या देश राम का है यह
जो कारे-बद के लिए धन जुटाए जाते हैं
अजब नशा है सनातन का देश में लोगो
जो लाखों जन यहाँ गीता सुनाए जाते हैं
सलीक़ा प्यार का आया नहीं जिन्हें देखो
हमें उन्हीं से सलीक़े सिखाए जाते हैं
हमें तो कुछ भी नहीं आप से गिला-शिकवा
फिर आप किस लिए नज़रें झुकाए जाते हैं
उदासियों का सफ़र है हमारी आँखों में
ये हम हैं फिर भी 'कँवल' मुस्कुराये जाते हैं
सृजन - 8 दिसम्बर, 2025
मात्राभार- 1212 1122 1212 22