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पत्थरों को हुस्ने-आज़र दे दिया - रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’46
पत्थरों को हुस्ने-आज़र दे दिया
आइनों को संगे- मरमर दे दिया
मुंतज़र था जिस घड़ी का, आपने
वस्ल का पुरलुत्फ़ मंज़र दे दिया
इश्क़ की राहें न थीं मुश्किल से कम
हौसलों ने दिल मुनव्वर दे दिया
मुब्तला थे सब उदासी में जहाँ
मैंने इक दिल फ़हम शायर दे दिया
जो सनातन सभ्यता का दम भरे
वक़्त ने ऐसा पयंबर दे दिया
है कृपा ईश्वर की मुझ पर अनगिनत
मेरी आशा से भी बढ़कर दे दिया
रश्क सब करने लगे मुझ पे 'कॅंवल'
मैंने जब गागर में सागर दे दिया
सृजन : 20 अप्रैल,2025
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
कोलकाता से प्रकाशित होने वाले सदीनामा के 24 अप्रैल,२०२५ के अंक में प्रकाशित