#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’41
दिल की धड़कन पे एतबार किया
जी ने जब चाहा खुल के प्यार किया
बेसबब तेरा इन्तिज़ार किया
दिल के दफ़्तर को ख़ुशगवार किया
जब भी बदली है आपने डीपी
आप को याद बार- बार किया
नम्बरों को बदल के यूं तुमने
इस मोबाईल को बेक़रार किया
वस्ल के गाँव जब भी याद आए
शहरे- फ़ुरकत ने तार – तार किया
एकजुट हो गए वतन वाले
जब सियासत ने मिल के वार किया
मौसमे-गुल ने जब लुभाया 'कँवल'
जिस्म ने सोलहो सिंगार किया
सृजन- 1 जुलाई, 2025
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन