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दूर जाकर न जा सकी फिर से - रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’44
दूर जाकर न जा सकी फिर से
मेरे पहलू में आ गयी फिर से
आफतों की नदी बही फिर से
है पहाड़ों पे त्रासदी फिर से
तेरे दर्शन से लौट आएगी
दिल के गुलशन में ताज़गी फिर से
आ तेरे आने से ही आएगी
मेरे कमरे में रौशनी फिर से
हम किराये के घर में रहते है
याद करवा रहा कोई फिर से
बिछ रहा हाईवे का जाल यहाँ
लौट आएगी ज़िन्दगी फिर से
उनकी परमाणु बम की धमकी पर
देना होग़ा सबक़ कोई फिर से
वार टैरिफ़ का चल रहा है 'कँवल'
देश हित की हवा चली फिर से
सृजन - 11 अगस्त, 2025
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन