#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’40
थोड़ी ख़ुशी, क्यों बेसी ग़म
सोच के बेकल हो गये हम
शीतलता हो जाए न कम
फूलों पर बरसी शबनम
पथरीली राहों ने कहा
आगे है सुख का मौसम
दिल में इक बेदिल क्यों है
सोच के आंखें हो गईं नम
संगमरमर सी शिलाओं पर
शिल्प कुशलता है अनुपम
उसके सिवा कोई और नहीं
दावा करे है एक धरम
राम का मंदिर देखो 'कॅंवल'
तन-मन-धन का है संगम