#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’38
तुझे पाने की ज़िद में मुबतला हूं
सदा रंगीन सपने देखता हूं
घटाओं को हवाओं ने समेटा
न अब बारिश लुभावन देखता हूं
न अपनी जाति का जिसको पता है
कहे वो हिंदुओं का रहनुमा हूं
किसी औरत की अस्मत लुट रही है
शराफ़त को बिलखते देखता हूँ
मुझे ग़द्दारों की सुहबत है हासिल
मैं हिंडनबर्ग की साज़िश रहा हूं
जमाती ज़ुल्म मुझ पर कर रहे हैं
मैं बंगलादेश का हिंदू बना हूं
ग़ज़ल कहने का है माहौल क्या जो
ग़ज़ल की बंदिशों में खो गया हूं
सृजन : 14 अगस्त,2024
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन