#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’37
जो है संघर्ष सदियों का संजोने का जतन रखना
सनातन आस्थाओं को सदा मन का वसन रखना
न है विस्तार अपना लक्ष्य दुनिया मान ले दिल से
हमारा देश कैसे हो सबल चिंतन मनन रखना
शमित करना सुगंधित वासनाओं के प्रलोभन को
सुरक्षित देश-हित जिससे हो उस पथ पर गमन रखना
समझना,सोचना, मत सौंप देना एक पल में सब
अगर हो प्यार सच्चा फिर समर्पित तन बदन रखना
करो जो पारदर्शी वक़्फ़ का दफ़्तर तो हंगामा
बताओ कैसे हो मुमकिन सभी को हमसुखन रखना
अगर दीवार मर्यादा की कोई तोड़ना चाहे
भयंकर रूप धर कर उन दरिंदों पर नयन रखना
सियासत भा गई है अब ‘कँवल' को यूं कि कहते हैं
कहाँ मुमकिन बुढ़ापे में भजन का आचमन रखना
सृजन 10 अप्रैल, 2025
मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन
1222 1222 1222 1222
25 अप्रैल, 2025 को प्रभात खबर,पटना के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित
इंदौर से प्रकाशित पत्रिका 'हस्ताक्षर' के मई,2025 अंक में प्रकाशित