#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’36
जो वादों का उनके ठिकाना नहीं है
हमें उनसे रिश्ता निभाना नहीं है
अगर विडिओ काल करने लगें वो
खयालों का दीपक जलाना नहीं है
हमें भा गई है फरिश्तों की सुहबत
कहा किसने मौसम सुहाना नहीं है
कहीं इनको ग़म की नज़र लग न जाए
ख़ुशी का ख़ज़ाना दिखाना नहीं है
बहुत योजनाएं हैं शासन की यारो
न जो लाभ ले वो सयाना नहीं है
उम्मीदों का सूरज जो हो बादलों मे
निराशा को घर में बसाना नहीं है
'कँवल' कीजिए बंद नेकी का दफ़्तर
भलाई का अब वो ज़माना नहीं है
सृजन : 18 मई, 2025
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन