Back to List

जो लोग थे ग़रीब दवा को तरस गए

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’70
ज़ालिम अमीर लोग दुआ को तरस गए
मुफ़लिस बिमार लोग दवा को तरस गए
सब हुस्न के पुजारी मज़ा को तरस गये
हम साहिबे ख़ुलूस वफ़ा को तरस‌ गये
घुसपैठिए थे जितने दया को तरस गये
ऐसी हवा चली कि ख़ता को तरस गये
जब देश भक्त देने लगे दंड और सज़ा
थे जितने देशद्रोही जज़ा को तरस गए
अपने वतन में हिंदुओं को मिल रही सज़ा
वे मां के भजन भक्ति निदा को तरस गए *
इतनी थी ठंड लोगों की बन आई जान पर
मुफ़लिस अलाव और क़बा को तरस गए
जब शहरे बेवफाई में हम खो गए 'कँवल'
ये दस्ते-हुनर रंगे-हिना को तरस गए
सृजन : 22 दिसम्बर, 2025
** 21 दिसम्बर, 2025 को पूर्वी मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) के एक स्कूल के कार्यक्रम में महबूब मलिक आयोजक ने लग्नजिता चक्रबर्ती, सिंगर को जागो माँ भजन गाने से रोका और यह कहते हुए पीटा कि सेक्युलर गाना गाओ |
फ़ेसबुक पर 24 दिसम्बर, 2025 को प्रसारित
मांझी दर्पण के 28-12-2025 के अंक में प्रकाशित
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन