#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’68
जब नज़र कोई रूपसी आई
दिल के गुलशन में ताज़गी आई
साथ जब मेरे मुफ़लिसी आई
सब के चेहरे पे बेरुख़ी आई
ज़िंदगी जीने हम लगे खुल कर
जब ख़यालों में पुख़्तगी आई
आपके दीद की तलब थी इसे
आप आए तो मौत भी आई
छत पे सिमटी जो सूर्य की किरणें
बिजली बिल में कमी बड़ी आई
आज डिजिटल सबूत मिलने लगे
जांच में जिन से बेहतरी आई
रंग लाने लगी सियासत फिर
न्यूज में देख बाबरी आई
मरने वालों को जब निकाला गया
वोटरों में बड़ी कमी आई
क़हर रफ़्तार का 'कँवल' देखो
शाहराहों पे बेहिसी आई
सृजन - 16 दिसम्बर, 2025
मात्राभार 2122 1212 22