#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’27
क़ह्र ढायेगी बेबसी कब तक
तमतमाएगी मुफ़लिसी कब तक
वो दिखाएंगे बेरुखी कब तक
रंग लायेगी आशिक़ी कब तक
होगी ख़ुश यार की गली कब तक
मुस्कुरायेगी ज़िन्दगी कब तक
लह्र सागर की जोश में है बहुत
दूर हो पायेगी नदी कब तक
जो हैं ख़ुश औरों को ख़ुशी देकर
उनको तरसायेगी ख़ुशी कब तक
मुस्कुराहट लिबास है जिनका
उनकी आंखों में हो नमी कब तक
आशना होना जिसकी फ़ितरत है
वो रहे मुझसे अजनबी कब तक
शिल्प-भाषा का ज्ञान हो न जिन्हें
उनको भायेगी शायरी कब तकs
तजमीन का शे'र
मुंतज़िर हैं मेरे इरादे भी
'खून थूकेगी ज़िंदगी कब तक'
लम्स दीदार का न मिल पाया
अब ‘कँवल’ लब पे ताज़गी कब तक
सृजन 10 मार्च,2025