#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’20
इस इश्क़ से नशीला कोई नशा नहीं है
लब चूमने से बढ़कर कोई मज़ा नहीं है
महताब के उजाले से दो बदन हैं रोशन
दीपक से दूर होकर कोई गिला नहीं है
खारे समुंदरों से मीठी नदी का मिलना
इस हौसले से बढ़ कर कोई हौसला नहीं है
सूरज को छोड़कर सब लौट आये घोंसलों में
उसे त्यागना जो डूबे कोई ख़ता नहीं है
तय कर रहा वतन है हर रोज़ एक मंज़िल
इस राहबर से बढ़कर कोई हमनवा नहीं है
बुनियाद पड़ रही है प्राचीन सभ्यता की
ऐसा हजारों बरसों तक में हुआ नहीं है
है आपकी नवाज़िश है आपकी इनायत
सच है 'कँवल' जहाँ में कोई आप सा नहीं है
सृजन : 27 फ़रवरी, 2024
मफ़ऊलु फ़ाइलातुन मफ़ऊलु फ़ाइलातुन