#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’66
आस्था की हसीं नदी से मिले
छठ में सब लोग सादगी से मिले
ख़ार में गुल जो ताज़गी से मिले
हम भी दुख में बड़ी ख़ुशी से मिले
सोचता हूं कि आपसे मिल कर
मुद्दतों बाद आदमी से मिले
ग़ैर की क्या कहें वो ग़ैर रहे
लोग अपने भी बरहमी से मिले
फ़ोन में अपने भूलना जग को
पाठ हमको नई सदी से मिले
कितना मुश्किल था चैन से जीना
जब मिले आप ज़िन्दगी से मिले
आंच शबनम भी दे रही है 'कँवल'
लफ़्ज़ फूलों की शायरी से मिले
सृजन - 28 अक्टूबर, 2025
सदीनामा ,कोलकाता के 29-10-2025 अंक में प्रकाशित
ज़ख्म फूलों की दोस्ती से मिले (मखमूर सईदी)
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