#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’04
अपने लोगों को अजनबी कहना
दोस्ती को है दुश्मनी कहना
मुझको उलझन में डाल देता है
ज़िंदा लाशों को आदमी कहना
प्यार एक पल अगर जो मिल जाए
दोस्त उस पल को इक सदी कहना
आहनी हैं इरादे रहबर के
भूल कर भी न शबनमी कहना
हम भी पलकें बिछाए बैठे हैं
ज़िन्दगी! तुम से है यही कहना
तीरगी से तुम्हें लगे जब डर
घुप ॲंधेरे को रौशनी कहना
जिससे कोई सबक़ मिले न 'कँवल'
शे'र ऐसा नहीं कभी कहना
सृजन - 4 अगस्त, 2025
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन